मृत्यु सत्य मानव तन मोक्ष पाने का सतमार्ग- राजेंद्र दास

भागवत कथा के चौथे ऋषि शुकदेव जी महाराज परीक्षित संवाद, विदुर चरित्र व देवी सती कथा का हुआ वर्णन

भागवत कथा सुनने को उमड़ी हजारों की भीड़, भक्तों ने चखा प्रसाद

आर पी यादव ब्यूरो चीफ यू पी फाइट टाइम्स

कौशाम्बी। जिले के चरकमुनि स्थल चरवा में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन श्रीमद् जगतगुरु द्वारिका मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्र दास जी महाराज महर्षि सुखदेव जी महाराज तथा राजा परीक्षित की कथा का वर्णन किया। इस मौके पर उन्होंने बताया सात दिन बाद मौत को सुनकर राजा परीक्षित का मन व्याकुल हो गया। जिस पर उन्होंने बताया कि यह मानव शरीर आपको पुण्य कार्य करने के लिए मिली है यह पुण्य ही एक रास्ता है जिससे यह पुण्य कार्य आपको बैकुंठ पहुंचा सकते हैं, इस शरीर का सदुपयोग करें। इस मौके पर उन्होंने विदुर कथा तथा देवी सती की कथा का भी भावपूर्ण कथा वाचन किया, कथा सुनकर पहुंचे भक्त श्रद्धालु भाव बिभोर नजर आए।

इस मौके पर उन्होंने शुकदेव परीक्षित संवाद का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार परीक्षित महाराज वनों में काफी दूर चले गए। उनको प्यास लगी, पास में समीक ऋषि के आश्रम में पहुंचे और बोले ऋषिवर मुझे पानी पिला दो मुझे प्यास लगी है, लेकिन समीक ऋषि समाधि में थे, इसलिए पानी नहीं पिला सके।

परीक्षित ने सोचा कि इसने मेरा अपमान किया है मुझे भी इसका अपमान करना चाहिए। उसने पास में से एक मरा हुआ सर्प उठाया और समीक ऋषि के गले में डाल दिया। यह सूचना पास में खेल रहे बच्चों ने समीक ऋषि के पुत्र को दी। ऋषि के पुत्र ने नदी का जल हाथ में लेकर शाप दे डाला जिसने मेरे पिता का अपमान किया है आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प पक्षी आएगा और उसे जलाकर भस्म कर देगा।


समीक ऋषि को जब यह पता चला तो उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा कि यह तो महान धर्मात्मा राजा परीक्षित है और यह अपराध इन्होंने कलियुग के वशीभूत होकर किया है। देवयोग वश परीक्षित ने आज वही मुकुट पहन रखा था। समीक ऋषि ने यह सूचना जाकर परीक्षित महाराज को दी कि आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प पक्षी तुम्हें जलाकर नष्ट कर देगा। यह सुनकर परीक्षित महाराज दुखी नहीं हुए और अपना राज्य अपने पुत्र जन्मेजय को सौंपकर गंगा नदी के तट पर पहुंचे। वहां पर बड़े बड़े ऋषि, मुनि देवता आ पहुंचे और अंत मे व्यास नंदन शुकदेव वहां पर पहुंचे। शुकदेव को देखकर सभी ने खड़े होकर शुकदेव का स्वागत किया। शुकदेव इस संसार में भागवत का ज्ञान देने के लिए ही प्रकट हुए हैं। शुकदेव का जन्म विचित्र तरीके से हुआ, कहते हैं बारह वर्ष तक मां के गर्भ में शुकदेव जी रहे। एक बार शुकदेव जी पर देवलोक की अप्सरा रंभा आकर्षित हो गई और उनसे प्रणय निवेदन किया। शुकदेव ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। जब वह बहुत कोशिश कर चुकी, तो शुकदेव ने पूछा, आप मेरा ध्यान क्यों आकर्षित कर रही हैं। मैं तो उस सार्थक रस को पा चुका हूं, जिससे क्षण भर हटने से जीवन निरर्थक होने लगता है। मैं उस रस को छोडक़र जीवन को निरर्थक बनाना नहीं चाहता। इसके साथ उन्होंने देवी सती तथा विदुर चरित्र का भावमय में चित्रण किया।


इस मौके पर कथा में महाराज जी ने मौजूद भक्तगणों को कथा सुनाते हुए कहा कि सभी के धर्म की आचरण का परम फल भगवान के श्री चरण बिना में अनुराग पाना ही होता है। यदि भगवती कथा में प्रीति न हुई तो सभी धर्म अनुष्ठान साधन आदि श्रम मात्र माने जाते हैं। इस मौके पर महाराज वेद लक्षण भारतीय शुद्ध गौ माता को समाज व राष्ट्र के लिए आवश्यक अंग बताते हुए कहा कि भारतीय को गोरक्षा करना हम सब का परम कर्तव्य है। गाय की रक्षा से जहां धरती माता अपना भोजन ग्रहण कर पुष्ट हैं वही मानवता की भी रक्षा होती है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि अन्य नस्ल की गाय दूध तो देती होगी पर उनके दूध पैर में वह गुण नहीं होती जो भारतीय वेद लक्षण गायों में होते हैं। वैसे भी हमारे शास्त्रों में पृथ्वी, गाय व नदी को देवतुल्य मानते हुए उनकी रक्षा की प्रेरणा दी गई है।


श्रीमद् भागवत कथा स्थल पर हजारों लोगों ने चल रहे भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया। इस मौके पर प्रमुख रूप से मुख्य श्रोता श्री बरम बाबा महाराज, पूज्य श्री धनंजय दास जी महाराज के सहित में परम् पूज्य रंग महल पीठाधीश्वर श्री श्री 108 श्री राम शरण दास जी महाराज (अयोध्या), श्री महन्त गौरीशंकर दास जी महाराज ( अयोध्या ) महामहिम राष्ट्रपति पुरस्कार पुरस्कृत डॉ. रविन्द्र नाथ शुक्ल, और श्री रमेश शुक्ल , सुशील शुक्ल, श्री गोपाल नन्दन मिश्र, माननीय न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ( हाईकोर्ट प्रयागराज ) सहित हजारों हजार की संख्या में भक्त गण मौजूद रहे।

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